‘How the ancient history of India in modern times came to be noticed’ Introduction Ancient Indian civilization was unlike those […]

“भारत में मानव समाज और ग्राम जीवन की ओर विकास“
भारत में आदिम मानव
इतिहास लिखे जाने से बहुत पहले, उत्तर भारत भी प्रागैतिहासिक यूरोप की तरह हिमयुगों से होकर गुज़रा । दूसरे अंतर्हीमयुग (लगभग 4,00,000 से 200,000 ईशा पूर्व) के बाद भारत में मानव गतिविधियों के सबसे प्रारंभिक प्रमाण मिलते हैं । ये प्रमाण मुख्यतः पंजाब की सोहन घाटी में पाए गए पुरापाषाणकालीन कंकड़ उपकरणों के रूप में सामने आते हैं, जिनमें सोहन संस्कृति का उद्भव हुआ ।
सोहन संस्कृति के औजार इंग्लैंड, अफ्रीका और चीन में पाए गए औजारों से अत्यंत समान थे । जिससे यह स्पष्ट होता है कि यह संपूर्ण पुरानी दुनिया की एक साझा तकनीकी परंपरा का हिस्सा थी ।
भारत में सोहन संस्कृति के औजारों के साथ किसी मानव कंकाल के अवशेष नहीं मिले हैं, किंतु विश्व के अन्य क्षेत्रों में इसी प्रकार की औद्योगिक संस्कृतियों को आदिम मानव जातियों से जोड़ा गया है ।
उदाहरण स्वरूप, जावा और चीन में पाए गए पीथेकेंथ्रोपस जैसे मानव रूप से यह अनुमान लगाया जाता है कि भारत में सबसे प्रारम्भिक औजार निर्माता पूर्णतः आधुनिक मानव नहीं थे ।
लगभग इसी काल में, या कुछ बाद में, दक्षिण भारत में एक दूसरी संस्कृति विकसित हुई, जिसे मद्रास संस्कृति कहा जाता है । इस संस्कृति के लोगों ने बड़े कंकड़ो से पलक उतारकर उत्कृष्ट औजार सुंदर हाथ-कुलाड़ियां बनाई, जिससे उनके तकनिकी कौशल में सोहन संस्कृति की तुलना में अधिक परिपक्वता दिखाई देती है ।

मद्रास सांस्कृतिक व अफ्रीकी, पश्चिमी यूरोप और दक्षिणी इंग्लैंड की कोर-औजार संस्कृतियों से घनिष्ठ सामंजस्य पाया जाता है । सोहन संस्कृति के विपरीत, विश्व के अन्य क्षेत्रों में ऐसी संस्कृतियों को वास्तविक होमोसेपिएस से जोड़ा गया है । इससे यह संकेत मिलता है कि दक्षिण भारत में उस समय अधिक विकसित मानव जाति निवास कर रही थी ।
इस काल में गंगा घाटी, भूवैज्ञानिक दृष्टि से अभी नहीं थी और सम्भवत उथले समुद्र से ढंकी हुई थी । फिर भी, कभी कभी एक क्षेत्र की सांस्कृति के औजार दूसरे क्षेत्र में पाए जाते हैं, जिससे यह संकेत मिलता है कि राजस्थान के रास्ते उत्तर भारत और दक्षिण भारत के प्राकृतिक ऐतिहासिक समूहों के बीच सीमित संपर्क रहा होगा ।

इन पुरापाषाणकालीन मानव ने भारत में हजारों वर्षों तक जीवन बिताया । वे शिकारी और खाद्य संघ्रह करता थे, तथा छोटे घुमनतू समूह में रहते थे ।वे पत्थर के औजारों का प्रयोग करते थे, आग का उपयोग जानते थे और पशु चर्म, वृक्षों की छाल तथा पत्तियों से अपने जीवन निर्वाह करते थे । यह भी संभव है कि उन्होंने जंगली कुत्ते के पालतू बनाना प्रारंभ कर दिया, जो उनके शिविरों के आस पास रहता था ।
दीर्घ काल तक भारत में होमोसेपिएस के निरंतर उपस्थिति बनी रही । समय के साथ उन्होंने अपने कौशल और तकनीकों में सुधार किया और अंतत: सुक्षम पाषण उपकरणों (microliths) का निर्माण किया । ये छोटे छोटे पत्थर के फलक और तीरों के फलक उत्तर पश्चिमी सीमा से लेकर दक्षिण भारत तक व्यापक रूप से पाये जाते हैं । इससे सांस्कृतिक निरंतरता और अनुकूलन का संकेत मिलता है ना कि अचानक परिवर्तन का ।
भारतीय सूक्ष्म पाषाण औजार निकट पर्व और अफ्रीका के औजारों से मिलते जुलते हैं, हालांकि उनका सटीक कलाणुक्रमिक संबंध अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है । दक्कन के कुछ क्षेत्रों में सूक्ष्म पाषाण औजार चमकाए गए पाषाण कुल्हाड़ी के साथ पाए गए हैं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि विभिन्न तकनीके एक दूसरे के साथ सहअस्तित्व में थीं ।
भारतीय प्रायद्वीप के कुछ दूरस्थ क्षेत्रों में पाषाण औजार धातु औजारों के साथ भी प्रयुक्त होते रहे । कुछ स्थानों पर सूक्ष्म पाषाण, औजारों का स्थान लोहे ने केवल ईसवि युग के प्रारंभ में लिया । यह तथ्य तकनीकी परिवर्तन की धीमी और असमान प्रकृति को दर्शाता है ।

नवपाषाण क्रांति
लगभग 10,000 से 6000 ईसा पूर्व के बीच मानव जीवन में एक बड़ा परिवर्तन आया । गार्डन चाइल्ड ने इसे प्रकृति के प्रति मानव के ‘आक्रामक दृष्टिकोण’ के रूप में परिभाषित किया ।इस काल में मानव ने कृषि, पशुपालन, मृदभांड, निर्माण, पुनाई तथा चमकाए गए पाषाण औजारों का विकास किया जिससे नवपाषाण युग का आरंभ हुआ ।
नवपाषाणकालीन औजार भारत के विभिन्न भागों में, विशेषकर उत्तर पश्चिम और दक्कन में पाए गए हैं । ये प्रायः भूमि की सतह से निकट मिलते हैं । नौ पाषाण संस्कृति इतनी दीर्घकाल तक बनी रही कि भारत की कुछ पहाड़ी जनजातियां हाल तक इसी अवस्था में जीवन व्यतीत करती रही, जो जीवन पद्धतियों की गहरी निरंतरता को दर्शाता है ।
प्रथम ग्रामो का उदय
कृषि के विकास के बाद स्थायी ग्रामो का उदय हुआ । भारत में सबसे प्रारम्भिक स्थायी ग्राम बलूचिस्तान और निचले सिंध क्षेत्र में पाए गए हैं । जिनका काल संभवतः चौथी सह्श्राब्दी ईशा पूर्व के अंत का है, यह विकास मध्यपूर्व की तुलना में कुछ बाद में हुआ ।
लगभग 3000 ईसा पूर्व के आसपास सिंधु क्षेत्र और बलूचिस्तान की जलवायु आज से बहुत भिन्न थी । वहाँ घने वन, प्रचुर नदियां तथा हाथी और गैंडे जैसी जंगली पशु पाए जाते थे । यह क्षेत्र अनेक कृषि ग्रामों को पोषित करता था, जो आज के शुष्क परिदृश्य से बिल्कुल विपरीत था ।
प्रारंभिक गांव समुदाय छोटे आकार के थे, जिनका विस्तार कुछ एकड़ो से अधिक नहीं होता था । यहाँ कच्ची इंटों के मकान, पत्थर की नींव अच्छी तरह पकाई गई एवं चित्रित मृदुभांड तथा तांबे के औजारों का उपयोग मिलता है, जो अपेक्षाकृत उन्नत संस्कृत का दर्शाता है ।
पर्वतीय घाटियों और सीमित संपर्क के कारण विभिन्न ग्राम संस्कृतियां अलग अलग विकसित हुईं । इससे अलग अलग मृदभांड शैलियाँ विकसित हुई- उत्तर में लाल मृदुभांड और दक्षिण में बफरंग के मृदभांड । दफन संस्कारों में भी विविधता दिखाई देती है ।

कुल्ली संस्कृति और नाल संस्कृति
मकराण क्षेत्र के कुल्ली संस्कृति में मृतकों का दाह संस्कार किया जाता था, जबकि ब्राहुइ पहाड़ियों की नाल संस्कृति में आंशिक दफन प्रथा प्रचलित थी, जिसमें हस्तियां आंशिक दहन या शव अनावृति के बाद दफनाई जाती थी । इससे धार्मिक विश्वासों की विविधता स्पष्ट होती है ।
इन प्रारम्भिक ग्रामों का धर्म मुख्यत: प्रजनन और उर्वरता पर केंद्रित था । मातदेवी की पूजा व्यापक थी, जिसके टेराकोटा प्रतिमाएं अनेक स्थानों से प्राप्त हुई हैं । झोब संस्कृति के स्थलों पर प्राप्त लिंग प्रतीक भूमध्यसागर और मध्य-पूर्वी संस्कृतियों के सामान उर्वता प्रतिकवाद के दर्शाते हैं ।
मातदेवी से जुड़ा हुआ बैल का प्रतिक भी व्यापक रूप से मिलता है । कुल्ली और राणा घुडई जैसे स्थलों के मूर्तियां और मृदभांडो में बैल की आकृतिया पाई गई है, जो अन्य प्राचीन कृषि संस्कृतियों के साथ प्रतीकात्म्क निरंतरता को दर्शाती है ।

कुल्ली संस्कृति के लोग कुशल कारीगर थे । उन्होंने उत्कीर्ण पत्थर की छोटी पेटियां बनाई, जिनका उपयोग संभवत: प्रसाधन यह सुगंधित पदार्थ रखने के लिए किया जाता था । ऐसी पेटियां प्रारंभिक मैं मेसोपोटामिया स्थलों पर भी मिली है, जिससे भारत और मध्य पूर्व के बीच समुद्री व्यापार का संकेत मिलता है ।
सुषा में कुल्ली शैली की नक़ल वाली चित्रित मृदभांडे पाई गई हैं । स्थल मार्ग से व्यापार के परमाणु के अभाव में यह निष्कर्ष निकलता है की यह संपर्क समुद्री मार्ग से हुआ । इस प्रकार कुल्ली संस्कृति भारत की प्रारंभिक व्यापारिक संस्कृति में से एक मानी जाती है ।
निष्कर्ष
इस प्रकार हिमयुगीन शिकारी समूह से लेकर स्थायी कृषक ग्रामो तक, भारत में आदिम मानव का विकास एक सतत तकनीकी, सामाजिक और धार्मिक प्रक्रिया के माध्यम से हुआ । यह विकास वैश्विक प्रागैतिहासिक प्रवृतियों से जुड़ा हुआ था, किंतु भारत की विशिष्ट भौगोलिक परिस्थितियों और दीर्घ सांस्कृतिक निरंतरता ने इसे एक विशिष्ट स्वरूप प्रदान किया ।
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