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आधुनिक काल में भारत के प्राचीन इतिहास को कैसे पहचाना गया?
भूमिका
प्राचीन भारतीय सभ्यता मिस्र, मेषोपोटामिया अथवा यूनान जैसी सभ्यताओं से इस अर्थ में भिन्न थी कि इसकी सांस्कृतिक परंपराएं बिना किसी बड़े व्यवधान के आधुनिक काल तक निरंतर चलती रहे। मिस्र और इराक़ में साधारण जनता पुरातत्व के आरम्भ से पहले ही अपने प्राचीन अतीत की स्मृति खो चुकी थी। यूनान में भी शिक्षित लोगों को शास्त्रीय एथिंस के बारे में केवल धुंधली जानकारी थी।
भारत में स्थिती भिन्न थी। यह समाज अपनी प्राचीनता के प्रति सचेत बना रहा। गांवों की लोककथाओं में लगभग 1000 ईशा पूर्व के मुखियाओं का उल्लेख मिलता है और ब्राह्मण बहुत प्राचीन काल में रचित वैधिक मंत्रों का निरंतर पाठ करते रहे। चीन के साथ साथ भारत विश्व की सबसे पुरानी सतत संस्कृतिक परंपरा वाला देश था।
किंन्तु सांस्कृतिक निरंतरता का अर्थ आधुनिक इतिहास बोध नहीं था। भारत में अतीत की स्मृति महा काव्य, पुराणों, अनुष्ठानों और परम्पराओं के माध्यम से सुरक्षित रही न की आलोचनात्मक, कालानुक्रमिक इतिहास लेखन के रूप में । परिणामस्वरूप 18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध तक भारत के प्राचीन इतिहास का कई वैज्ञानिक एवं आलोचनात्मक अध्ययन विकसित नहीं हो सका ।
जसोइट, पूर्वगामी और भाषाएं संकेत
कुछ जसोइट मिशनरियो ने संस्कृत सीखी, किंतु उनके प्रयास व्यक्तिगत और सीमित रहे । मलबार में 1699 से 1732 के बीच कार्यरत फादर हैंगस्लेडन ने किसी यूरोपीय भाषा में पहला सांस्कृतिक व्याकरण तैयार किया परन्तु व प्रकाशित नहीं हो सका।
1767 में फादर कोरेदु ने सांस्कृतिक और यूरोपीय भाषाओं के बीच संबंध को पहचाना । किंन्तु उन्होंने इसकी व्याख्या बबलिए वंश परंपरा के आधार पर की । इन प्रयास से भाषा वैज्ञानिक अंतर्दृष्टि तो मिली । परंतु ऐतिहासिक पुनर्निर्माण संभव नहीं हुआ ।
औपनिवेशिक दृष्टिकोण और इसका योगदान
1765 में बंगाल और बिहार ईस्ट इंडिया कम्पनी के अधीन आ गए । प्रशासन को शासन में कठिनाई हुई क्योंकि वे हिंदू उत्तराधिकार कानून को नहीं समझते थे । इसी समस्या के समाधान हेतु 1776 में मनुस्मृति का अंग्रेजी अनुवाद ‘ ए कोड ऑफ जेनटू लॉज‘ के रूप में किया गया । प्रारंभिक ऐतिहासिक अध्ययन मुख्य कानून रीतियों और सामाजिक प्रथाओं तक सीमित रहे ।
एशियाटिक सोसाइटी और प्राच्य अध्ययन की नींव
इन प्रयास के परिणाम स्वरूप 1784 में कलकत्ता में एशियाई सोसाइटी और बेंगाल की स्थापना हुई । इसके संस्थापक र्विलियम जोंस थे, जो ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारी थे । उन्होंने यह प्रतिपादित किया कि संस्कृत, लैटिन और ग्रीक एक ही भाषा परिवार से संबंधित है।
1789 में उन्होंने अभिज्ञानशकुंतलम का अंग्रेजी अनुवाद किया । चार्ल्स वेलकिंस ने 1784 में भागवत गीता का अनुवाद किया । इसके बाद 1804 में बॉम्बे एशियाटिक सोसाइटी और 1823 में लंदन में एशियाटिक सोसाइटी ऑफ़ ग्रेट ब्रिटेन की स्थापना हुई ।
1784 से 1794 के बीच कई मौलिक अनुवाद प्रकाशित हुए-
इन प्रयास यूरोप में भारत विद्या को प्रोत्साहित किया।
यूरोप में भारत विद्या का विस्तार (1795 से 1832)
सर विलियम जोन्स के बाद हेनरी कोल ब्रोके और होरिस हेमन विल्सन जैसे विद्वानो ने ग्रंथी अध्ययन को आगे बढ़ाया । एकेटिल-दुपेरू ने वार्षिक माध्यम से उपनिषदों का अनुवाद किया ।
इस काल में संस्थागत विस्तार हुआ –
इतिहास अभी भी अभिजात्य और ग्रंथ केंद्रित था, परन्तु अब वह अंतर्राष्ट्रीय स्वरूप ले चुका था ।
तुलनात्मक भाषा विज्ञान और मैक्स मूलर
1816 में फ्रांज बॉप ने इंडो-यूरोपीय भाषा परिवार का वैज्ञानिक पुन:र्निर्माण किया । उन्नीसवीं शताब्दी में मैक्सवेल के नेतृत्व में भारत विद्या का सर्वाधिक विस्तार हुआ । उन्होंने ऋग्वेद तथा ‘सेक्रेट बुक्स ऑफ द ईस्ट’ का संपादन किया ।
इन ग्रंथों की भूमिका में कुछ पश्चिमी विद्वानों ने यह निष्कर्ष निकाला के प्राचीन भारतीयों में इतिहास बोध और कलानुक्रम की भावना का अभाव था, वे निरंकुश शासन के अभ्यस्त थे और सांसारीक मामलों के प्रति उदासीन थे । यह सामान्यकरण औपनिवेशिक दृष्टिकोण से प्रेरित था ।
वीए स्मिथ ऑपनिवेशक इतिहास लेखन
1904 में प्रकाशित ‘अर्ली हिस्ट्री ऑफ इंडिया’ में वी ए स्मिथ ने प्राचीन भारत का पहला व्यवस्थित इतिहास प्रस्तुत किया । लगभग आधा शताब्दी तक यह ग्रंथ मानक पाठ्य पुस्तक बना रहा । इसमें सिकंदर के आक्रमण को अत्यधिक महत्व दिया गया और ब्रिटेन शासन को भारत की राजनीतिक एकता का कारण बताया गया है । यह दृष्टिकोण ऑपनिवेशिक शासन को वैध ठहराने का प्रयास था ।
पुरातत्व और भौतिक साक्ष्य।
1837 में जेम्स प्रिंसिपल द्वारा ब्राह्मी लिपि के पठन से अशोक के अभिलेख समझे जा सके । जिससे भारतीय प्राचीन इतिहास को ठोस कालानुक्रम मिला । 1862 में एलेक्जेंडर कनिगम को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण का प्रथम निदेशक नियुक्त किया गया । उन्होंने इतिहास को केवल ग्रंथों तक सीमित न रखकर भौतिक अवशेषों से जोड़ दिया ।
वैज्ञानिक उत्खनन और सिंधु सभ्यता।
बींसवीं शताब्दी में वैज्ञानिक उत्खनन आरंभ हुआ । जॉन मार्शल के नेतृत्व में हड्डपा और मोइन जोदड़ों की खुदाई से सिंधु घाटी सभ्यता का पता चला, इससे यह सिद्ध हुआ की भारत में वैदिक सभ्यता से भी पहले एक विकसित नगरीय सभ्यता अस्तित्व में थी ।
राष्ट्रवादी इतिहास लेखन
ए एल बेशम की कृति ‘द वंडर दट वास् इंडिया’ (1951) ने संस्कृति और सभ्यता को इतिहास के केंद्र में रखा। दामोदर धर्मा नन्द कौशाम्बी ने मार्कसवादी दृष्टिकोण अपनाते हुए समाज और अर्थव्यवस्था का विशाल किया । उनके कार्यों ने भारतीय इतिहास लेखन को नई दिशा दी ।
निष्कर्ष: भारतीय इतिहास कैसे बना
भारतीय इतिहास एक बार में विकसित नहीं हुआ । वह स्मृति से ग्रंथ, ओपनिवेशक कानून से भाषा विज्ञान, साम्राज्यवादी राजनीति से पुरातत्व और अंततः सामाजिक आर्थिक विश्लेषकों तक क्रमिक रूप से विकसित हुआ । प्रत्येक पीढ़ी ने नए स्रोतों और नए पद्धतियों से अतीत को पुनर्लेखित किया । इस प्रकार भारतीय इतिहास लेखन केवल भारत के अतीत का अध्ययन नहीं है, बल्कि यह उस प्रक्रिया का इतिहास है जिसके माध्यम से भारत ने स्वयं को समझना सीखा ।